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भूमि पर रहने वाली पशु संपत्ति भी भूमि के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि स्वयं मनुष्य (बीएससी सेकंड ईयर हिंदी)

 भूमि पर रहने वाले पशु संपत्ति भी भूमि के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि मनुष्य, कवि की दृष्टि में यह पृथ्वी गौवों और अश्वों का बहुविध स्थान है ।देश में जो गोधन है उसकी जो नस्लें शस्त्रों वर्षों में से दूध और घी से हमारे शरीर को शक्ति आई है उनके अध्ययन रक्षण में भी उन्नति में दक्षित होना राष्ट्रीय कर्तव्य है गोधन के जींद होने से जनता के अपने शरीर भी क्षीण हो जाते ।हैं गांव के प्रति अनुकूलता और सोमनाथ से का भाव मनुष्य शरीर के प्रत्येक अंग को अन्न और रस से तृप्त रखता है

 जम्मू कश्मीर

 भारतीय गाय


ऊपर कहे हुए पार्थिव कल्याण से संपन्न मातृभूमि का स्वरूप अत्यंत मनोहर है उसके अतिरिक्त स्वर्णमणि रत्ना आदि निधियों की उसके रूप मंडल को और भी उत्तम बनाया है रत्न प्रश्न रत्न धारी यह पृथ्वी वसुधा नी है अर्थात सारी खुशियों का रक्षा स्थान है उसकी छाती में अत्यंत सुवर्ण भरा हुआ है । हीरण्यवक्षा भूमि के इस अपरिमित कोष का वर्णन करते हुए कवि की भाषा पूर्व तेज से चमक उठती है ।विश्व का भरण करने वाली रत्नों की खान हिरण्य से परिपूर्ण है मातृभूमि तुम्हारे ऊपर एक संसार की बसा हुआ है। तुम सब की प्राण स्थिति का कारण हो अपने गुण प्रदेश में तुम अनेक नीतियों का भरण करती हो तुम रत्ना और सुवर्ण की देने वाली हो रत्नों का वितरण करने वाली वसुधैव, प्रेम ,और प्रसन्नता से पुलकित होकर हमारे लिए कोषों को प्रदान करो। अटल के खड़ी हुई अनुकूल धेनु के सम्मान, हे माता तुम सहस्त्र धाराओं से अपने द्रविड़ का हमारे लिए दोहन करो हमारी कृपा से राष्ट्र के कोर्स अच्छा मियां निधियों से भरे पूरे  रहें। उनमें किसी प्रकार किसी कार्य के लिए कभी न्यूनता ना हो।

भारतवर्ष के स्वरूप का वर्णन

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