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सांस्कृतिक तत्वों को बुरा कहना भ्रामक है। इस कथन पर मानव शास्त्र की क्या दृष्टि है।

 डॉ योगेश अटल ने अपने निबंध संस्कृति और राष्ट्रीय एकीकरण में तर्कपूर्ण वर्क यह स्पष्ट किया है कि सांस्कृतिक तत्वों को अच्छा या बुरा कहना भ्रामक है।

मानव शास्त्र के अध्यापकों ने संस्कृति के इस उपनिवेशवाद भ्रम को तोड़ा ।वे यह स्थापित करने में सफल रहे कि कोई भी समाज संस्कृतविहीन नहीं होता। उनके अनुसार सांस्कृतिक तत्वों में अच्छा या बुरा का विभेद करना सर्वथा भ्रामक है।अच्छा या बुरा का भेज संस्कृति परख होती है यह बात सत्य है की एक संस्कृति वाले जिसे अनुकूल या अच्छा मानते हैं हो सकता है वह दूसरे के लिए प्रतिकूल और बुरा। इस कथ्य को एक उदाहरण से समझा जा सकता है कुछ लोग मांसाहार को क्रूरता का परिचायक मानते हैं तो कुछ पिछड़ेपन और बर्बरता का। मांसाहारी भी हर प्रकार के मांस नहीं ग्रहण। हिंदू संस्कृति में गोमांस वर्जित है तो मुसलमान सूअर का मांस नहीं खाते हैं।पश्चिम के लोग कुत्ते के गोश्त से परहेज करते हैं जबकि कोरिया के लोग तो सूअर और कुत्ते दोनों को गोश्त ग्रहण करते हैं।टपारिया यह है कि क्या खाया जा सकता है और किसे त्यागना है यह सब संस्कृति पर निर्भर है इसका औचित्य भी संस्कृति पर निर्भर है अतः सांस्कृतिक तत्वों को अच्छा या बुरा कहना मानव शास्त्रीय दृष्टिकोण से सर्वथा भ्रामक है।

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